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देवनागरी में लिखें

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Friday, 19 May 2017

"सीख"



“गुरु जी एक लघुकथा लिखने का विचार आया है”
“तो लिख डालो, किस उलझन में हो! आधार बिंदु क्या है लेखन का?”
“एक लड़का और एक लड़की बचपन से पड़ोस में रहते हैं... दोनों के बीच भाई बहन का रिश्ता रहता है... लड़की लड़के को भैया कहती है... केवल भैया कहती ही नहीं राखी भी बाँधती है... जब दोनों युवा होते हैं ,तो शादी कर लेते हैं...
“ये क्या लिखना चाहती हो... ऐसा कहीं होता है?”
“सत्य घटना है! सच्चाई है मेरी बातों में!”
“भाड़ में जाए ऐसी सच्चाई ... सत्य घटना है तो न्यूज़ पेपर की खबर बन छपने दो ... सत्य कथा लिखने का आधार बने .... तुम लघुकथा लिख रही हो .... समाज को एक संदेश देने का काम है लघुकथा लेखन ... सत्य हो या ना हो यथार्थ हो .... क्या तुम ऐसी बात लिख ये संदेश देना चाहती हो कि बचपन से राखी बाँधने का कोई मूल्य नहीं .... जब जो चाहे रिश्ते का रूप बदल दे सकता है! सत्य तो आज समाज में ये भी है कि सगा भाई-बाप .......... तो क्या लिखने के लिए यही बचा है .... धत्त ”
“तो क्या करूँ गुरु जी .... बातें झूठ लिखें”
“झूठ लिखने की सलाह तुम्हें कौन दे रहा है... अंत ऐसा कर सकती हो “जब दोनों शादी का निर्णय किये तो दोनों परिवारों में बहुत हंगामा हुआ .... विद्रोह होने से रंजिशें बढने लगी ... परिवार के खिलाफ जाकर दोनों ने शादी नहीं की .. आजीवन एक दुसरे के नहीं हुए तो किसी और के भी नहीं हुए ....

><><
@हर विधा का अपना अपना अनुशासन होता है
या तो अनुशासन मानों या विधा में लेखन ना करो
चयन करना रचनाकार का काम है

Thursday, 18 May 2017

"बदली नहीं क़िस्मत"

"बदली नहीं क़िस्मत"

"छोटका बाबूजी फिर से अकेले हो गए... दूसरी छोटी माँ भी हमारा साथ छोड़ गईं मुनिया" बड़े भैया से फ़ोन पर सूचना सुन सोच में गुम हो गई मुनिया
"काहे ? काहे दूसर बीयाह करवा देनी औरी हमनी के बानी सन ई ख़बर ना लड़की वालन के औरी बीयाह के ख़बर हमनी के ना भइल । काहे काहे! " दादी को झझकोरते हुए पूछा... पागल हो रहा था मुनिया का चचेरा भाई कौशल ।
मुनिया के छोटे बाबूजी(मुनिया के पिता के बड़े भाई जिन्हें मुनिया व मुनिया के सभी भाई छोटे बाबूजी कहते थे) दूसरी शादी कर लिए थे । चार बेटा दो बेटी के पिता थे.. सभी बच्चे बड़े हो चुके थे... एक बेटा व एक बेटी की शादी हो चुकी थी... दूसरे बेटे की शादी हो सकती थी... बेटी को एक बेटा भी था...
"हमार बबुआ के देह - नेह के करित... ? तू लोगन के आपन आपन गृहस्थी हो जाई अवरी तू लोग ओईमें रच बस ज ई ब लोगिन... केकरा फ़ुर्सत होई जे आपन बाबूजी के ख़्याल रख सकी..."
"ठीक बा! जब हमनी के बारे में ना बतावल ग इल त हमनी क नइखि सन"
"ए ई सन भी होखेला का... तब बतावल उचित ना लागल... अब सब कोई मिल-जुल के रहअ लोगिन..."
जब तक दूसरी छोटी माँ रही कोई मेल मिलाप नहीं हो सका... चौथा बेटा तो पागल हो कई बार मनोचिकित्सालय गया .... मुनिया के छोटे बाबूजी का अंत बेटों के संग ही हुआ...

Tuesday, 9 May 2017

“नया सवेरा”





रुग्न अवस्था में पड़ा पति अपनी पत्नी की ओर देखकर रोने लगा, “करमजली! तू करमजली नहीं... करमजले वो सारे लोग हैं जो तुझे इस नाम से बुलाते है...”
“आप भी तो इसी नाम से...”!
“पति फफक पड़ा... हाँ मैं भी... मुझे क्षमा कर दो”
“आप मेरे पति हैं... मैं आपको क्षमा... क्या अनर्थ करते हैं...”
“नहीं सौभाग्यवंती...”
“मैं सौभाग्यवंती...! पत्नी को बहुत आश्चर्य हुआ...”
“आज सोच रहा हूँ... जब मैं तुम्हें मारा-पीटा करता था, तो तुम्हें कैसा लगता रहा होगा...” कहकर पति फिर रोने लगा
 समय इतना बदलता है... पति के कलाई और उँगलियों पर दवाई मलती करमजली सोच रही थी... अब हमेशा दर्द और झुनझुनी से उसके पति बहुत परेशान रहते हैं... एक समय ऐसा था कि उनके झापड़ से लोग डरते थे... चटाक हुआ कि नीला-लाल हुआ वो जगह... अपने टूटी कान की बाली व कान से बहते पानी और फूटते फूटती बची आँखें कहाँ भूल पाई है आज तक करमजली फिर भी बोली “आप चुप हो जाएँ...”
“मुझे क्षमा कर दो...”
पत्नी चुप रही कुछ बोल नहीं पाई
“जानती हो... हमारे घर वाले ही हमारे रिश्ते के दुश्मन निकले... लगाई-बुझाई करके तुझे पिटवाते रहे... अब जब बीमार पड़ा हूँ तो सब किनारा कर गये... एक तू ही है जो मेरे साथ...
“मेरा आपका तो जन्म-जन्म का साथ है...’
पति फिर रोने लगा... मुझे क्षमा कर दो...”
“देखिये जब आँख खुले तब सबेरा... आप सारी बातें भूल जाइए...”
“और तुम...”?
“मैं भी भूलने की कोशिश करूँगी... भूल जाने में ही सारा सुख है...”
पत्नी की ओर देख पति सोचने लगा कि अपनी समझदार पत्नी को अब तक मैं पहचान नहीं सका... 
आज आँख खुली... इतनी देर से

Sunday, 7 May 2017

“भूमिका”




“आज तो तुम बहुत खुश होगी... माँ-बाबूजी गाँव लौट रहे हैं!
“पर क्यों”?
“गुनाह करके मासूमियत से पूछ रही.. क्यों”?
“गुनाह”?
“हाँ! आज तुमने भोलू के गाल पर चाँटा जड़ दिया क्यों”?
“भोलू मेरा भी बेटा है... उसका भला-बुरा देखना मेरा काम है... वह बतमीजी कर रहा था...”
“तो क्या हुआ? हमारा इकलौता बेटा है... माँ-बाबूजी तुम्हारे इस चाँटे को अपने गाल पर महसूस किया है... बाबूजी का कहना है, बहू के ऐसे चाँटे खाने से अच्छा है हमलोग गाँव में रहें... तुम भी शायद यही चाहती हो न”
“क्या बात कर रहे हैं... मैं ऐसा क्यों चाहूँगी”?
“ताकि तुमको उनकी सेवा न करनी पड़े...”
“यह आपकी गलत सोच है... कल यदि गोलू बिगड़ गया तो सारा दोष मुझ पर आ जायेगा... 
(चोर वाली कहानी याद है न जो जेल में अपनी माँ से मिलने की इच्छा रखता है) ... 
बन गया बेटा लायक तो सारा श्रेय आपलोग ले जायेंगे... मुझे श्रेय की नहीं, बेटे के भविष्य की चिंता है... 
इकलौते बेटों का भविष्य मैंने अन्य कई घरों में देखा है...”
“तो...!”
“देखिये! आप माँ-बाबूजी को समझाइए... मैं आखिर उसकी माँ हूँ...”
           मैं उसकी माँ हूँ... यह संवाद भोलू की दादी के कानों में पड़ा तो उन्हें अतीत के दिन याद हो आये जब वह भोलू के पिता के संग अपने अन्य बच्चों की गलतियों पर उनको एक चाँटा तो क्या डंडो से पीटने में गुरेज नहीं करती थी... वह सामने आयी और बोली “यह माँ है... इसकी यही भूमिका है... हमलोग दादा-दादी हैं हमलोगों की अपनी भूमिका है... जब बहू भी दादी बनेगी तो इसे भी ऐसे ही बुरा लगेगा जैसे हमलोगों को लगा है...
” इसके बाद सास ने बहू को गले से लगा लिया!


काश अंत सच होता


Friday, 28 April 2017

उपचार...



Image result for मानसिक विकृति


रक्षा-बंधन के दिन रीमा राखी और मिठाई का डिब्बा लेकर सबेरे ही सबेरे केदार बाबु के घर पहुँच गई... राखी और मिठाई का डिब्बा एक मेज पर रखकर , केदार बाबु का चरण-स्पर्श किया । इतने में दुसरे कमरे से निकलकर उनकी पत्नी आई तो रीमा ने उनका भी चरण-स्पर्श किया।
"मैंने आपको पहचाना नहीं" केदार बाबु की पत्नी ने कहा।
"भैया ने आपको मेरे बारे में कुछ नहीं बतलाया ! क्यों भैया आपने ऐसा क्यों किया ? मैं इनकी छोटी बहन हूँ... आप मेरी भाभी हैं"।
"क्यों जी ! आपकी कोई कोई छोटी बहन भी है ! आपने कभी मुझे बतलाया नहीं "
ये सब सुनकर केदार बाबु स्तब्ध रह गये । उनकी दशा यूँ हुई मानो काटो तो खून नहीं...
"भाभी पहले मैं भैया को राखी बाँध लूँ । फिर बैठ कर आराम से बातें करेंगे"।
केदार बाबु के पास कोई चारा नहीं था ,उन्होंने अपने सिर पर रुमाल रखा और अपनी दाहिनी कलाई रीमा के सामने बढ़ा दी
                      राखी बाँधकर रीमा ने मिठाई का एक टुकड़ा केदार बाबु के मुँह में डाल दिया और कहा "भैया! मेरी उम्र भी आपको लग जाए"
इतना सुनकर शर्म और अपमान से घूंटते हुए केदार बाबु के आँखों से आँसू निकल आये
यह देखकर केदार बाबु की पत्नी ने कहा "अरे! आपदोनों भाई-बहन में इतना प्रेम है और मुझे पता तक नहीं "!
"भाभी हमदोनों तो एक ही विद्यालय में पढ़ाते हैं और मध्यांतर(टिफिन) में अक्सर एक साथ खाना खाते हैं "
"मगर ये तो कभी भी मध्यांतर भोजन डिब्बा तो ले ही नहीं जाते हैं "केदार बाबु की पत्नी ने कहा
"मैं जो लाती हूँ! फिर ये क्यों लाते..."
उधर केदार बाबु के आँखों से आँसू थम ही नहीं रहे थे और ये वे मन में सोच रहे थे कि "मैं लोगों से आज तक रीमा और अपने बारे में प्रेमालाप की झूठी बातें फैलता रहा वो अपने मन में बोल रहे थे कि "धिक्कार है मुझ पर !
रीमा सोच रही थी दो सहेलियों से मिला सुझाव

पहली सहेली  "मुँह पर चप्पल मारो"
दूसरी सहेली "घर जाकर राखी बाँध आओ"

तब तक केदार बाबु की पत्नी चाय नाश्ता का इंतजाम कर लाते हुए बोली " रोते हुए ही रहोगे कि बहन को कुछ नेग-वेग भी दोगे!


Wednesday, 12 April 2017

कृष्ण सुदामा



अपने घनिष्ट मित्र नंदनी के पार्थिव शरीर, अग्नि को सौंप कर सतीश अपने भावों को यादों का खाद पानी दे सींच रहा
उसकी बिटिया की शादी अचानक से तैय हो गई जल्दबाज़ी में लाखों का इंतज़ाम करना था ... समय ने उसे आखिर सीखा ही दिया कि 
लेखन के राजा/रानी को लक्ष्मी का साथ नहीं मिलता ना ही सगे रिश्तेदार क़रीब आना चाहते हैं
दिन क़रीब आता जा रहा था और चिंता बढ़ती जा रही थी। .... एक दिन वो अपने कमरे में बैठा था कि नंदनी उससे मिलने आई उदासी में घिरे मित्र को देख। .... चिंता का कारण जान गई । ... बिना रक़म भरे हस्ताक्षर कर चेक थमाते हुए बोली कि बैंक में रखा रक़म मिट्टी ही है। जब दोस्त के काम ना आए जितना है, सब निकाल लेना और बिटिया की शादी धूम-धाम से कर , अपनी मुस्कुराहट वापस ले आना। 
बिटिया की शादी के कई महीनों के बाद। ... सतीष जब रक़म वापस करने लगा तो नंदनी बोली
क्या रक़म तुम्हारे हाथों में दी थी?
ना हाथ में दी थी ना हाथ में लूँगी!
जहाँ से लिए थे वहीं रख आओ। .... फिर किसी के काम आ जाएँगे"

Sunday, 9 April 2017

हौसला




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टूटता तारा-
आस पाए युगल
जकड़े हाथ।

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हाँ तो क्यूँ कहा जाता उन्हें चोर
हाथ सफाई दिखलाये जादूगर
कर जाता समान इधर का उधर
लालच पैसे का करता मन मैली
देते लेते शब्दों की सुंदरतम थैली
दौड़ उम्दा सृजनता के चक्कर
दो-दो पंक्तियाँ ले यहाँ-वहाँ से
लो कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा
छपास रचना का खजाना जोड़ा
नकल करने में अक्ल से वंचित
सारा ध्यान तो रहा करने में चोरी
जमीं खिसक गई नभ छूना बलज़ोरी

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अरे सबसे मिट्टी की तुलना क्यूँ 
वो भी केवल कच्ची मिट्टी से
रिश्ता मिट्टी का क्यूँ होता है 
कुछ हुआ नहीं कि गलने लगता है
पंगा लोगे तो दंगा सहना ही होगा
विमर्श में विवाद उत्पन्न करने का शौक़ 
व्यंग बोलने वाले शौक़ीन