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देवनागरी में लिखें

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Sunday, 15 October 2017

"समझ"


-एक्सपायरिंग डेट हो गई हैं आप अम्मा जी"
-चल इसी बात पर कुछ चटपटा बना खिला" खिलखिलाते हुए पचासी साल की सास और अड़तीस-चालीस साल की बहू चुहल कर रही थी
-आज मुझे *एक दीया शहीदों के नाम* का जलाने जाना है... काश ! आप भी..."
-पोते की शादी चैन से देख लेने दे"
-यानि अभी और भी पंद्रह-बीस साल..."
-और नहीं तो क्या... क्या कभी सबके श्राप फलित होते देखी है..."
-आपके पहले मैं या मेरे पहले आप टिकट कटवाएँगे सासु जी..."
-संग-संग चलेंगे... समय के साथ खाद-पानी-हवा का असर होता है" दोनों की उन्मुक्त हँसी गूंज गई...




Thursday, 12 October 2017

स्वार्थ में रिश्ते


पिछले कई दिनों से शहर के अलग अलग जगहों पर स्वच्छता अभियान चल रहा था… आज सुबह भी मंत्री जी अपने टीम के साथ, वार्ड पार्षद के साथ भी कुछ लोग आने ही वाले थे, अखबार मीडिया की टीम , युवाओं की टोली और अनेक संगठन-संस्था के सदस्य , स्थानीय लोग अभियान स्थल पर पहुंचे और स्थल से कचरा ही गायब.. खलबली-भदगड़ मच गई
-हद है! कैसे कचरा उठ सकता है... नगर निगम वालों को कुछ तो सोचना चाहिये था... अब मंत्री जी आएंगे तो क्या होगा?
-मंत्री जी के आगमन की बात सुन, घबराहट में ऐसा हो गया होगा
-अरे फोन करो... फोन करो...
ट्रिन ट्रिन
-हेलो!
-इतनी सुबह सवेरे ?
-आपने बिना मंत्री जी के आये कचरा कैसे उठवा लिया?
-हमें भी तो जबाब देना पड़ता है!
-भेजवाईये आयोजन-स्थल पर कचरा।।
-ऐसा कैसे हो सकता है? तिहरा मेहनताना देना होगा...
-क्यों?
-कचरा उठाया मजदूर , फिर लाकर गिरायेगा , फिर उठाएगा
-वो सब हमलोग बाद में मिल बैठ सलटा लेंगे... आखिर हमलोग मित्र हैं... दांत नहीं पीसना मजबूरी थी
-आपकी खुशी में ही हमारी खुशी है...

Monday, 9 October 2017

बैसाखी


संगनी क्लब व सामयिक परिवेश क्लब के अनेक कार्यक्रमों में रत्ना पुरकायस्था(दूरदर्शन में उप निदेशक) जी से कई बार भेंट हुई... उनकी मोहक मुस्कान और दूरदर्शन आने का निमंत्रण(स्वाभाविक हर मिलने वालों से वे कहती हैं) मेरे दूरदर्शन जाने का राह खोल दिया । समीर जी से उनका फोन नम्बर ली , ले तो उनसे भी सकती थी लेकिन समीर जी सामयिक परिवेश क्लब के आयोजक थे तो उनसे ही मांगना सहज लगा।
उनसे मिलने जाने के पहले लेख्य-मंजूषा के सदस्यों से पूछी कि कोई चलना चाहेगा... एक से दो भले... बुचिया #ज्योति_स्पर्श  जी संग चलने के लिए तैयार हुईं.... हमें #अनेक_कामों के लिए एक संग निकलना ही था तो मैं उन्हें ही बोली कि रत्ना जी को फोन कर समय ले लें....
सोमवार 9 सितम्बर2017 दोपहर साढ़े बारह बजे के बाद का समय मिला... मैं और बुचिया बड़े उत्साहित रत्ना जी से मिले... पहले से कुछ लोग बैठे... हमारे रहते अनेक लोग आए-गए... सभी लोगों से बातें करने का जो स्वाभाविक(कोई अभिनय नहीं) ढ़ंग था रत्ना जी का बेहद चुम्बकीय था... बच्चों की तरह निर्मल मन ..भावुकता से भरी छलकने को तैयार आँखें... #हम_बहुत_ही_खुश_थे
मैं गई थी लेख्य-मंजूषा के सदस्यों का कार्यक्रम हो इसकी मंशा लेकर लेकिन बातों के क्रम में #हाइकु की चर्चा निकली तो वे बोली कि मैं सोच रही हूँ कि #महिला_हाइकुकार का कार्यक्रम करवाया जाए..… या तो लेख्य-मंजूषा के सदस्य हो जाएं तो ठीक नहीं तो पटना में रहने वाली हाइकुकार का नाम और फोन नम्बर मुझे व्हाट्सएप पर भेज दीजियेगा...
उसी दौरान किसी अन्य से बात करने के क्रम में उनके पति का पर्यटन विभाग में काम करने की चर्चा चली...
(दूरदर्शन जाने के लिए घर से निकलते समय मेरे पति महोदय का सवाल था #तुम्हें_दूरदर्शन_में_ऐसा_कौन_मिल_गया_या_गई_हैं_जिनसे तुम दूरदर्शन पहुंच जाओगी
-रत्ना जी
-रत्ना पुरकायस्था जी ?
-हाँ!
-उनके पति पर्यटन विभाग में काम करते हैं!
-मुझे जानकारी नहीं है और अभी लौट कर आते हैं तो बात करते हैं ... पहले ही बहुत देर हो चुकी हुँ ... आपकी बातें सुनने लगी तो आज का मौका निकल जायेगा...
ये जा... वो जा.. मैं अति उत्साहित निकल भागी)
#मैं:-आपके पति पर्यटन विभाग में काम करते हैं ? मेरे पति बता रहे थे
-आपके पति ? क्या नाम है उनका ? क्या काम करते हैं ?
-जी । डॉ. अरुण कुमार श्रीवास्तव । चीफ इंजीनियर...
-वही जो मोकामा में कहीं...
-दो साल पहले थे बरौनी थर्मल के G.M. 31 जुलाई 2017 को पटना हेडक्वाटर से सेवा निवृत हो चुके हैं
रत्ना जी बच्चों की तरह खिलखिला पड़ीं
-अरे😂🤣 ! वे तो मेरे पति के बहुत ही अच्छे मित्र हैं । मैं भी मिली हुई हूँ । हमारे घर भी कई बार आये हैं । उनका बहुत सम्मान करते हैं मेरे पति । जबभी उनकी चर्चा करते हैं उनके व्यक्तित्व की बहुत प्रशंसा करते हैं । पर्यटन विभाग का कार्यालय पहले कंकड़बाग में था । श्रीवास्तव जी के ही सलाह और समझाने पर IEI भवन में स्थापित हुआ। etc अनेक बातें वे करती रहीं
और #मेरा_फ्यूज_उड़_चुका_था...

Tuesday, 26 September 2017

भ्रम टूटा


20 सितम्बर को दिल्ली स्टेशन पर ट्रेन में बैठे साढ़े ग्यारह-बारह बजे तक फोन से बात कर सोई तो सुबह चंडीगढ़ में आँख खुली... सधारणत: ऐसा मेरे साथ होता नहीं है .... मेरी नींद इतनी गाढ़ी कभी नहीं हुई कि समान चोरी हो जाये... फोन चोरी होने से सबसे सम्पर्क खत्म हो गया.... 

"रणनीतिज्ञ"


"सक्सेना मैम... मैम... सक्सेना मैम..."
आश्चर्य हुआ उसे कि देश से इतनी दूर जर्सी के सड़क पर उसे कौन आवाज दे सकता है फिर भी मुड़कर देखी तो एक नौजवान दौड़ता हुआ उसकी ओर आता दिखा
और करीब आकर उसके चरण-स्पर्श कर बोला "आप मुझे पहचान नहीं सकीं न ?"
"नहीं! नहीं पहचान सकी... आप कौन हैं और मुझे कैसे पहचानते हैं ?"
"दो साल मुझे विद्यालय में आये हो गये थे... सभी सेक्शन की शिक्षिकाएं मुझसे त्रस्त हो गई थीं... मैं बेहद उधमी बच्चा था... आख़िरकार मुझे सुधारने के लिए आपके सेक्शन में भेजा गया... आपने मुझे एक महीना उधम मचाने दिया बिना रोक-टोक के... एक महीना कुर्सी से बाँध कर रखा ,कक्षा शुरू होने से लेकर कक्षा अंत होने तक... पूरे एक महीने के बाद जो आज़ादी मिली तो उधम-उत्पात खो गये थे...
"ओह्ह्ह! कौशल?" चहक उठी सक्सेना मैम...

Saturday, 12 August 2017

जिन्दगी के विभिन्न रंग (शेड)


"इतनी सब्जियाँ ! क्या सिंह साहब की पत्नी बाहर से लौट आईं ? प्रात: के सैर और योगासन के बाद पार्क में बैठे वर्मा जी अचम्भित थे... सिंह साहब भांति-भांति के सब्जियाँ खरीद कर झोला भर उठा रहे थे... सुबह के समय पार्क के बाहर सब्जी-जूस बेचने वालों की भीड़ जमा होती थी...
"अरे वर्मा जी, सिंह साहब की पत्नी को गुजरे वर्षों हो गए!" शर्मा जी बोले
"तो क्या सिंह साहब खुद से खाना पकाते हैं?"
"नहीं न! दाई(मेड) रखते हैं ।"
"ओह अच्छा!"
"दाई को २० हज़ार रुपया देता हूँ वर्मा जी! इस उम्र में दूसरी शादी करता तो दस तरह की किच-किच होता... पत्नी होती भी तो उसके साथ भी कई समस्याएँ होती...! मन का पकाने के लिए बोलता तो दस बहाने होते...
मेड रखता हूँ आज़ाद पक्षी की तरह जीवन जी रहा हूँ...!" सिंह साहब की ख़ुशी छिपाए नहीं छिप रही थी...
"भाभी जी नमस्कार... घर आए कई लोग बोल जाते हैं...!" शर्मा जी फुसफुसाए...


Wednesday, 9 August 2017

दूत मिलता है... तलाश हमें करनी होगी...


1994 के 29 अगस्त को हमलोग पटना शिफ्ट कर गये थे... हमारे घर से थोड़ी दूरी पर परिचित बे-औलाद वृद्ध दम्पत्ति रहते थे... वे लोग बहुत खुश हुए हमारे पटना आने से... यूँ तो उनके साथ पति-पत्नी दोनों के भतीजे का परिवार रहता था... दोनों के भतीजे के परिवार में ये सोच था , मैं क्यूँ किसी तरह की मदद करूँ वो करे... एक दाई रही सदा... लेकिन पैसों के मामले में मेरे पति पर ही विश्वास रहा... वृद्ध की मौत सन् 1994 में और वृद्धा की जिन्दगी सन् 2003 तक ही रही... नौ साल प्रतिदिन का बाहर से ख्याल हमलोग रखे... बैंक से पैसा निकाल कर ला देना... जब जरूरत पड़े डॉक्टर लाना... अस्पताल ले जाना... पेस मेकर लगवाना...
       लगभग पंद्रह दिनों पहले... दोपहर का समय था... मेरे पति ऑफिस में थे... मैं घर में अकेली थी... मुझे बुखार 102 था... पड़ोसन मिलने आईं... हम बात कर रहे थे लेकिन मेरा बुखार बढ़ रहा था... दवा लेने के बाद भी 105 हो गया... घबरा कर मेरी पड़ोसन की बेटी मेरे पति को फोन कर दी... आस-पास की तीन-चार पड़ोसन आ गईं... मेरे पति को ऑफिस से घर पहुँचने में समय लगता वे मेरे बड़े भाई को फोन कर दिए... बड़े भाई-बड़ी भाभी पहुँच गये... पानी की पट्टी और सर धोने से बुखार थोड़ी देर में उतर गया...

हमारा हश्र कैसा हो... ये तो विधाता रचता ही होगा लेकिन कुछ सहायता तो हमारी सोच... हमारे कर्म भी करते हैं...
आशा साहनी की स्थिति को समझने की कोशिश में हूँ क्यूँ कि कल मेरी स्थिति शायद... *शायद* वही हो
ना हो इसलिए पूरे शहर में होने वाली साहित्यिक गोष्ठियों में जाती हूँ... रोज़ दो-चार से फ़ोन पर बात करती हूँ... फ़ेसबूक पर सक्रिय रहती हूँ... अकेलापन या भीड़ हम तो चुन ही सकते हैं...
जबसे ख़बर मिली है तभी से सोच रही हूँ...
मान लेते हैं पूत कपूत है
पहले पति के मौत के बाद दूसरी शादी... तब तो पुत्र पर निर्भरता ख़त्म... दूसरे पति की भी मौत तीन-चार साल पहले... तो अकेले क्यूँ रही...

                                             ये बताने की जरूरत इसलिए पड़ी कि आशा साहनी अकेले यूँ क्यूँ मरी... समझ नहीं पा रही हूँ ...
-विश्वास की कमी उनमें थी ?
-कोई क्यूँ नहीं रहा(बेटा ही क्यूँ) दो-दो मकान होते हुए...